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आज  … दिन कुछ ख़ास है!

बूंदों की आहटों पे जब दिल मचलने लगे

दिल के समंदरों में जब ख्वाब पलने लगे

समझ लेना की आज  … दिन कुछ ख़ास है!

 

पलकों  के झरोखे में से नींद ढलने लगे

चंचल सी ये काली लटें, फिर घटाओं सी उड़ने लगे

समझ लेना की आज  … दिन कुछ ख़ास है!

 

जब ये ढलते आंसू  … किसी टीस का शुबा न करें

और ये मुस्कुराहटें किसी दर्द को पनाह ना दे

समझ लेना की आज … दिन कुछ ख़ास है!

 

ये दिन जो बहुत ख़ास है … मानो सालों की तलाश है

छोड़ आये वो दर्द हम आज, चाय के नुक्कड़ के पीछे  …

जहां खिलखिलाते लफ़्ज़ों में मानो शायरी की साज़ थी,

जहां दोस्तों की बकबकी में भी … ख़ुदा की आवाज थी

जहां चाचा के पकोड़ों में कम्बख्त मिर्च बहुत तेज़ थी

पर चटपटी उन चटनियों में, जिंदगी उल्लास थी |

 

समझ गए हम चाय की उस चुस्की को लेते हुए

ये पल भी उड़ रहे हैं दुःख को समेटे हुए,

तो क्या हुआ की वो ना हुआ, जो चाहा था हमने

जो हो गया है… वो भी किसी बेनसीब की तलाश थी |

 

तो चल आज ये पल जी लेते हैं,

हर दर्द जो चुभ रहा है खंजर की तरह

उसे भी चुस्की मार कर पी लेते हैं ,

और बढ़ाते हैं कदम…कुछ गुनगुनाते, कुछ मुस्कुराते

किसी नयी राहे पे … किसी नए नुक्कड़ की तरफ

 

फिर जब आने लगे सौंधी खुशबुएं …गरम तेल से निकलते हुए उन बेढंगे पकोड़ों की

और हौले हौले उफान पे आती उस कड़क चाय की

तब फ़िर समझ लेना की आज…दिन कुछ ख़ास है!

 

आज कुछ नए सपनो को … नयी उड़ान की तलाश है

हां … आज दिन कुछ ख़ास है!

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