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तू है…और है भी नहीं !

नम हुईं ये पलकें जब , लफ़्ज़ों की यूँ आंधी चली, तू है …और है भी नहीं! तेरा साया है दीवारों पे... मगर, सूनापन है तेरे साथ में भी, तू उठ रहा …कभी बैठ रहा …कदमों से ये घर नाप रहा, तेरे क़दमों की आहट तो है पर मेरे हाथों में वो हाथ नहीं मैं… Continue reading तू है…और है भी नहीं !

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